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हरियाली संवाद में मीरा

हरियाली संवाद में मीरा

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देखो रे नटखट कृष्ण मनमोहन !

व्यथित मन के उपवन को हर्षानें सुहावनी हरियाली लेकर पावन मन्द पवन बहती हुई पुरवाई लाई ।

 

कारी बदला में जैसे पीताम्बरी पहने आए हैं जैसे मोरपंख धारण किए श्यामल मोरे कृष्ण कन्हाई।

मुदित मन में मुस्काती मीरा ! सुन्दर छवि निहारती मीरा !

अपने सलोने श्याम से सावन मिलन को सुन्दर काव्य में रच डाली।

हर आहत पर जैसे आएं मन के द्वार पर मनमोहन कृष्ण कन्हाई !!

वन में जैसे नाचे मयुर वैसे ही मीरा की मधुवन लहराई ।

कृष्ण प्रेम को आतुर मीरा !

विरह की व्यथा में मीरा !

कृष्ण से करती गुहार : प्रियतम ! सावन की मधुर मधुरिमा में आन मिलो एकबार ।

राधा के संग कंदब की डाली पर झुले हो जैसे !

यमुना के बैठे हो तीरे,

मधुर सुरीली बांसुरी की छेड़े मीठी तान..

वैसे ही गिरिधर हरियाली सावन में हमें सुना दो वही मीठी तान !

तेरी छवि हृदय में बसा कर मीरा पद में सजाकर गाती भजन दिन रैन ।

हरियाली सावन में कृष्ण की बाट जोहती मीरा ।

पीड़ा अपनी हृदय में रखकर सजीली सावन को कहती !

तरसी अब अंखिया मोरी !

देखो मेरे नटखट कृष्ण गोपाल !

सुन्दर मनोहर घटा है छाई,

मुदित मन्द पवन बहे पुरवैया

हरियाली हर्षित होकर सुन्दर सावन है लाई!

अंतिम पहर आने से पहले…

आ … जाओ … वैसे ही मेरे प्रियतम!

मेरे सुन्दर श्याम सलोने कृष्ण कन्हाई !!

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

     मुम्बई

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