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माटी के तन

माटी के तन

 

माटी से बना ये सुंदर काया,

माटी में ही मिल जाना है।

फिर कैसा घमंड, कैसी ईर्ष्या,

एक दिन सब ढह जाना है।

 

आज है माटी ऊपर-ऊपर,

कल माटी के नीचे होना है।

दो दिन का मेला है ये जग,

फिर माटी में ही सोना है।

 

माटी गोदी में रखती सबको,

माटी तो सबकी माता है।

जो माटी से प्रेम रखता है,

वो कभी नहीं घबराता है।

 

माटी का तन, माटी का मन,

माटी से ही है अपना जीवन।

घमंड ना कर इस काया पर,

एक दिन माटी में ही मिलन।

 

चाहे तन पर सोने की चादर ,

माटी की गोद में होगा अंत।

फिर क्यों नफरत करता है,

सबसे मिलकर रहना संत।

 

माटी के पुतला कुछ तो बोलो,

तन माटी का,माटी से जोड़ो,

ना कुछ तेरा घर,धन दौलत,

ये मानव अहंकार को छोड़ो।

 

   चन्द्रकला शर्मा 

   प्रधान पाठक 

 बेमेतरा छत्तीसगढ़

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