
विषय:- हमारी शान तिरंगा है
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पहरेदारी में हमारी शान है तिरंगा
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मुगलों-अंग्रेजों के गुलाम रहें हम,
आजादी तो महसूस किए हैं चंगा।
पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस,
आजादी से हमारी शान है तिरंगा।।
राष्ट्रभक्ति रखते स्वतंत्रता सेनानी,
जेल में काट दिखाये हैं प्रेम तरंगा।
खादी पहन स्वदेशी अपनाते हुए,
नारा लगाते हमारी शान है तिरंगा।।
अठारह सौ संतावन देश भक्तों ने,
भारत की आजादी हेतु लिए पंगा।
बलिदानियों ने फाॅंसी में झूल कहें,
अब तो बस हमारी शान है तिरंगा।।
स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्र स्वाभिमानी,
आजादी हेतु बजाए बिगुल-मृदंगा।
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी,
फहरे फिर हमारी शान है तिरंगा।।
इंकलाब जिंदाबाद नारे लगाए वे,
देशभक्त थे नहीं थे कभी हूडदंगा।
जिगर में उनके पल रहे थे सपने,
लहराए जो हमारी शान है तिरंगा।।
बाइस जुलाई उन्नीस सौ सैंतालीस,
केसरिया,सफेद,हरा रुपेण तिरंगा।
सम्राट अशोक के धर्म चक्र मध्य में,
तब से अब ये हमारी शान है तिरंगा।।
केसरिया साहस,त्याग बलिदान के,
सफेद सच्चाई,शांति के पवित्र गंगा।
हरा समृद्धि,विश्वास,प्रगति समेटे है,
गति,न्याय,प्रगति प्रतीक शान तिरंगा।।
जल-थल-नभ में सेना लहराते हुए,
सीना तान करते प्रतिनिधित्व चंगा।
चौबीस घंटे जीवन,देश की निरंतर,
पहरेदारी में हमारी शान है तिरंगा।।
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स्वरचित मौलिक रचना संग
सुरेश कुमार बन्छोर अभ्यर्थी
हथखोज / देमार (पाटन)
तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़
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