विषय:- ” सावनी बयार

विषय:- ” सावनी बयार”
@ स्वरचित मौलिक
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बह चली सावनी बयार,
सुन्दर मनमोहक बुंदों की बौछार ।
तृप्त हो रही वसुन्धरा,
चारों ओर हरियाली छायी ।
खुशियों ने ली है अंगराई,
बह चली सावनी बयार ।
झुला पड़ गए बागों में,
कजरी गीतों से हुई गुलजार ।
प्रीत मादकता बरसाती,
सुन्दर मनमोहक बह चली सावनी बयार ।
हरी चुड़ियां खनक रही है,
दुल्हन जैसी सज रही है, नवयौवना हो या वृद्ध,
सब पर छायी सावनी बयार ।
चली- चली पनघट पर राधा,
सुन कर मधुर सुरीली बांसूरी की पुकार ।
धरा अम्बर देखता रहता,
सावनी रस की मीठी फुहार ।
आता होगा कहीं बुलावा ….
अम्मा भेज रही है तार ।
इस सावन में आना लाडो!
ताकती रहती हुं घर द्वार ।
तीज त्योहार आन पड़ी है,
बुलाया है मायका का प्यार ।
बह चली सावनी बयार ।
“आती हूं अम्मा…
ज़रा तुम ठहरो, इस सावनी बयार में..
फिर लौटेगी बचपन मेरी इसी सुन्दर मनमोहन सावनी बयार में… “
✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास
मुम्बई




