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मुस्कुराती कली गुलाब की

मुस्कुराती कली गुलाब की

 

खिली कली, खिलकर हँसी,

क्षण क्षण मुस्कुराती रही।

गुलाब की नन्हीं सी कली,

काँटों के बीच भी खिलती रही।

 

हँसती रही, मुस्कुराती रही,

काँटों के ऊपर रहकर भी,

दिखला दी जग को यह बात,

हिम्मत से खिलती हर रात।

 

मैं नन्हीं ही सही,

पर हूँ किसी से कम नहीं।

चाहे कितने भी संकट आएँ,

चाहे कितने भी दर्द सताएँ।

 

शूल चुभें राहों में चाहे,

फिर भी स्वभाव न छोड़ूँ कभी।

दर्द सहकर भी मुस्कुराऊँ,

हर पल अपनी राह बनाऊँ।

 

जग वालों, तुम भी सीखो

मुस्कुराना और आगे बढ़ना।

चाहे राहों में शूल बिछे,

चाहे राहों में रोड़े पड़े।

 

चाहे धूप हो या अँधेरा छाया हो,

चाहे अपनी ही विवशता हो।

मन को डगमग होने मत देना,

हर पल उम्मीद का दामन थामे रहना।

 

काँटों के बीच भी गुलाब खिले,

यही जीवन का संदेश है।

दुःख चाहे जितना भी आए,

मुस्कान ही मन की ताकत है।

 

नीलम प्रभा सिन्हा

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