सावन क्यों लगता मन भावन

सावन क्यों लगता मन भावन
सावन आया झूम के, हर गली हर मोड़ पे,
भीनी भीनी मिट्टी की खुशबू, मधुर हवाएँ ले कर आएँ।
मन के बंजर खेतों को भी सींच जाएँ,
बूँदों के संग छम छम बरसे रे।
मेरा आँगन हँसे और खिलखिलाए,
ठंडी ठंडी मस्त हवाएँ मन को सहलाएँ।
मीठी मीठी यादें जुड़ती जाएँ,
जो मन को बहलाएँ और जीवन में मिठास लाएँ।
प्यारी सखियाँ झूम रही सावन की बहारों में,
विकल हैं सखियाँ झूला झूलने को इन बहारों में।
मन के सूनेपन को रह रह कर भिगो दें,
यादें आकर नैनों को बरसात सा भिगो दें।
धरती खुशनुमा लगती हरी चादर ओढ़ के,
मेघा रे मेघा, बरसो रिमझिम सावन में।
लाओ खबर मेरे साजन के,
भीगी बूँदों में संदेशा ले आओ मेरे साजन के।
हरी हरी चूड़ियाँ पहन सब सखियाँ सजती जाएँ,
प्रकृति ने भी श्रृंगार किया, चारों ओर हरियाली छाए।
पेड़ों ने भी श्रृंगार किया नई नई पत्तियों से,
झूम उठी हर डाली कोमल कोमल कोंपलों से।
कोयल ने भी तान छेड़ी, पी कहूँ पी कहूँ पुकार सुनाए,
भींगती धरती संग मधुर स्मृतियाँ मुस्काएँ।
छत पर खड़ी खड़ी मैं भी भीगूँ, रह रह कर यादें आएँ,
रिमझिम रिमझिम बरखा की बूँदें मन की वीणा बजाएँ।
तेरी मेरी यादों से मन की सारी बातें भर जाएँ,
बिजली चमके, बादल गरजे, धड़कन बढ़ती जाए।
बरसों से सूना मन माँगे केवल प्रीत तुम्हारी,
सावन आते ही जाग उठे मन में चाहत प्यारी।
सावन में किसान भी मस्त मस्त हो जाए,
धरती भी मुस्काए, जब सावन की बूँदें आएँ।
किसान खेती कर बीज बोए और फसल लहलहाए,
हरी हरी बालियाँ मन को मोहें, लहर लहर लहराएँ।
सावन सखे, मन में भी प्रेम जगाता,
सूने मन में फिर से मधुर एहसास जगाता।
सावन मन भावन है, इसमें प्रकृति का प्यार मिले,
हर मन को प्रेम और जीवन का सुंदर उपहार मिले।
समाज के सभी इंसानों के साथ, बड़े हों या छोटे,
राजा हों या रंक, सभी के साथ प्रेम बरसाएँ।
सावन जैसे भेदभाव मिटाकर सबको अपना बनाए,
प्रेम की वर्षा से हर मन को खुशियों से भर जाए।
सावन हमें यही संदेश सुनाता,
प्रकृति की तरह प्रेम सब पर बरसाता।
मन में प्रेम हो तो हर मौसम मनभावन हो जाता,
इसीलिए सावन सबके मन को भाता।
— नीलम प्रभा सिन्हा




