
नमन मंच
दिनांक 17.8.26
नाम, अमिता मराठे
शहर, इंदौर
विधा, पद्य
विषय
अभिव्यक्ति या अफवाहों की फैक्ट्री
क्षण भर में अफवाहों की हवा गरम हो जाती,
तपकर हर मन को बुरी तरह झुलसा जाती।
दूर-दूर तक अग्नि-सी लपटें फैल जातीं,
अभिव्यक्ति की आज़ादी सहमकर रह जाती।
चाहकर भी मधुर वाणी मुख से निकल न पाती,
झूठ और फरेब के भय से चुप हो जाती।
सत्य की वाणी को हर पल जोखिम उठाना पड़ता,
सादगी और सफ़ाई का स्वर घायल हो जाता।
अफवाहों की एक चिनगारी ज्वाला बन जाती,
दूषित वायु की दुर्गंध साँसें घुटा जाती।
मैं चीख-चीखकर अभिव्यक्ति की गुहार लगाता,
सच के पक्ष में निर्भय होकर स्वर उठाता।
मैदान में खड़ा होकर मैं यह देख रहा हूँ—
घोर अँधियारे में भटक रही है
अभिव्यक्ति की दिव्य रोशनी।
लफ़्ज़ों का आकर्षण सबको लुभा तो लेता है,
पर अफवाहों का शोर सत्य को ढक देता है।
फिर अभिव्यक्ति स्वयं को चुपचाप छिपा लेती,
और अफवाहों की फैक्ट्री मुस्कुराती रहती।




