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शीर्षक: बचपन की बरसात

शीर्षक: बचपन की बरसात   

  

_डॉ. अंजली सामंत_

 

बचपन की बरसात आज भी मन में बसी है।  

दोपहर में अंधकार छा जाता था,  

तेज़ वायु और तूफान चलता था।  

ग्रीष्म में दूर से शीतल वायु का झोंका आता था॥1॥

 

गाय-बैल पूँछ उठाकर दौड़ते घर आते थे।  

आम्र वृक्ष से आम गिरते थे।  

ध्वनि सुनते ही बच्चे दौड़ पड़ते थे॥2॥

 

नानी लालटेन स्वच्छ करती थीं।  

 मेघ गर्जन और विद्युत चमकती।  

भयभीत होकर बच्चे घर की ओर दौड़ते।  

देवालय में दीप प्रज्वलित होता था।  

उसके प्रकाश से हृदय शांत हो जाता था॥3॥

 

गृह में प्रार्थना की पवित्र ध्वनि गूँजती थी।  

वृद्धजनों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते थे।  

लालटेन के समक्ष अध्ययन होता था।  

चूल्हे पर रोटी की सुगंध क्षुधा बढ़ा देती थी।  

कान माता की पुकार की प्रतीक्षा करते थे।  

उसकी एक ध्वनि पर सभी कार्य में लग जाते थे॥4॥

 

पिता, चाचा, भाई-बहनों के साथ  

सुखपूर्वक भोजन अमृततुल्य लगता था।  

थाली के निकट मार्जारी दुग्ध हेतु म्याऊँ-म्याऊँ करती थी।  

तीव्र वर्षा की बूंदें छत से मस्तक पर गिरती थीं।  

जीर्ण-शीर्ण छप्पर से जलधारा गिरती थी।  

उसके नीचे पात्र रखने का कार्य बढ़ जाता था॥5॥

 

भोजनोपरांत दादी और पिता की कथाएँ  

नेत्रों में निद्रा भर देती थीं।  

गृह में एक लालटेन, बाहर सघन अंधकार।  

ग्राम निस्तब्ध, कहीं विलीन हो जाता था।  

सघन वन में हमारा आवास व्याघ्र के गमनागमन मार्ग में था॥6॥

 

कभी-कभी व्याघ्र महाराज दहाड़कर भयभीत करते थे।  

गौ-वृष भी भय से लड़खड़ा जाते थे।  

प्राण हथेली पर रखकर हम `राम-राम` का जप करते थे।  

पिता हास्य में कहते, `एक दिवस व्याघ्र तुम बालकों को खा जाएगा।  

हम कभी दूर गए तो तुम भय से प्राण त्याग दोगे`? 

व्याघ्र अपने मार्ग से चला जाता, कभी वन त्याग देता॥7॥

 

आदिवासीजन व्याघ्र की अनेक कथाएँ सुनाते थे।  

भय के कारण `राम-राम` का `मरा-मरा` भी हो जाता था।  

स्वप्न में व्याघ्र पीछे दौड़ता, किंतु पकड़ न पाया।।8॥

 

आज ग्राम नगर बन रहा है।  

व्याघ्र वापस लौट कर आ गए है।  

 

और माता के हाथों की रोटी के लिए लालायित हैं।  

आज वर्षा हो रही है…  

माता अब कभी नहीं पुकारेगी।  

ग्राम से अंधकार बढ रहा है।  

और मैं स्वप्नों के पीछे दौड़ रही हूँ॥9।।

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