
विधा:-कविता
शीर्षक:– वाणी
मुख खोल तु अपना सोच के बंदे
मन के तराजू मे तोल के बंदे।
संसार टिका है वाणी के ऊपर
वाणी से जग में ना घोल जहर।
मृदु वाणी बोल रस रिश्ते में घोल
मोल न करना बोल बोली है अनमोल
मुख खोल तु अपना सोच के बंदे
मन के तराजू मे तोल के बंदे।
वाणी ही अपनों को गैर बनाती
गैर भी अपना बोली बनातीं।
बोली में सब रीति नीति
वाणी से ही होती अनीति।
भक्तिमय विश्वास की बातें
प्रीत के रंग मे सजाई बातें।
सब वाणी का खेल होता
अपने परायों का मेल होता।
मुख खोल तु अपना सोच के बंदे
मन के तराजू मे तोल के बंदे।।
बड़ें बड़ें योद्धा वाणी से हार जाये
वाणी ही संग्राम करायें।
महाभारत युद्ध का
कारण भी था वाणी।
वाणी मे सम्मान हो
मृदु मधुर मिठास हो।
प्रेम भाईचारा हो राष्ट्र का कल्याण
मृदु वाणी बोल रस रिश्ते में घोल।
स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा




