स्पर्श के रूप

स्पर्श के रूप
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स्पर्श नहीं केवल उँगली का, तन से तन तक जाना,
यह तो मन के मौन सरोवर में, प्रेम-तरंग बन आना।
माँ की ममता का कोमल स्पर्श, जीवन का वरदान,
जिससे पाकर शिशु रचता, अपना नव अभियान।
पिता के दृढ़ कर का स्पर्श, साहस का संचार,
काँटों वाले कठिन पथों को, कर देता साकार
गुरु का पावन दिव्य स्पर्श, अज्ञान-तम हर ले,
ज्ञान-सूर्य की स्वर्णिम किरणें, अंतर्मन में भर दे
मित्र का निष्कपट मधुर स्पर्श, विश्वासों का सेतु,
टूटे मन के सूने आँगन में, बन जाता है हेतु
करुणा का निर्मल स्पर्श सदा, पीड़ा हर ले मौन,
सूखी डाली पर भी जैसे, गूँज उठे मधु-गान
प्रेमिल स्पर्श आत्मा छू ले, मिट जाए हर भेद,
जाति, धर्म, भाषा से ऊपर, जोड़ दे मानव-खेद
ईश्वर का अदृश्य स्पर्श जब, अंतर में मुस्काए,
भटका हुआ पथिक भी अपना, सत्य-पथ पा जाए
स्पर्श वही जो घाव भर दे, आशा का दीप जलाए,
हर हृदय में प्रेम, दया, सेवा के, नव अंकुर उपजाए
तन का स्पर्श क्षणिक हो सकता, मन का रहे अमर,
पावन स्पर्श वही कहलाए, जो कर दे जीवन निखर।
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डॉ रेणु श्रीवास्तव भोपाल
सादर समीक्षार्थ 🙏




