
“पुरी की रथयात्रा”
श्रीजगन्नाथपुरी में आज समंदर की लहर करें गुहार,
चहुंओर श्री जय जगन्नाथ की गूंजे जय जयकार।
सामने मंदिर के सजे हुए,तीन विशाल रथ खड़े हैं,
जैसे स्वर्ग से धरती पर सब ,देवी देवता उतर पड़े हैं।
तालध्वज पर दाऊ बैठे, नंदी घोष पर कृष्ण कन्हैया,
दर्प दलन पर विराजमान , लाड़ली सुभद्रा मैया।
लकड़ी, रस्सी, कपड़े से बने रथ में लगे आस्था के पहिए ,
करोड़ों भक्त श्रद्धा से खड़े, मन में एक विश्वास लिए।
राजा खुद सोने की झाड़ू लिये प्रभु के आगे चलते है,
छेरा पहरा कर के सबका, सम्मान बराबर करते है।
लाखों हाथ एक साथ जब,रस्सी थाम लेकर चलता है,
“जय जगन्नाथ” के जयकारे से, आसमान हिल उठता है।
गुंडिचा मंदिर से लेकर तीन किलोमीटर तक का सफर,
नौ दिन मौसी घर ठहरें नीलाचल में जगत के ईश्वर।
नीले अंबर तले सजे रथ,सोने के सुंदर चमक रहे हैं,
बलभद्र, सुभद्रा संग कन्हैया, भक्तों से मिलन करें हैं।
ओडिशा की धरती धन्य है, जहां जगत के नाथ उतरें हुए,
भक्तों के श्रद्धा के आंसू से, सागर के जल भरे हुए।
समंदर की लहरें भी किनारे आकर नाचने लगा,
जगत के नाथ स्वयं पधारे, प्रभु चरणों को धोने लगा।
मां सुभद्रे, बलदाऊ जी,सत् सत, नमन श्री जगन्नाथा ,
हाथ जोड़ करूं मैं विनती, चरणों में झुके माथा।
चन्द्रकला शर्मा
प्रधान पाठक
बेमेतरा छत्तीसगढ़



