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गजल सृजन 

गजल सृजन 

काफिया — आती की बंदिश 

रदीफ — है।

बहर –1222—-1222—1222—-1222=28

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नहीं अब तुम छिपोगे श्याम वंशी याद आती है।

मुरलिया की मधुर धुन गुनगुना कर मन लुभाती है।

 

नयन जब मूँद लेती हूँ दिखाई पड़ रहे मोहन,

तुम्हारी छवि हृदय को फिर नजर आकर हँसाती है।

 

यशोदा के लला तू पास आओ माखन खिलाऊँ,

तुम्हारे दर्शन सुखद आस मन ही मन जगाती है।

 

तुम्हारी शरण राधा-श्याम की है प्रीत गाये गी ,

दया की एक झलक हरे वही पीरा रुलाती है।

 

‘सुरभि’ आ श्याम चरणों में विनय करती सदा से है,

कृपा कान्हा करो जीवन सफल सबका बनाती है।

 

स्वरचित 

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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