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रक्षासूत्र

रक्षासूत्र

 

राखी के धागे में बँधा,

केवल स्नेह का संसार नहीं,

यह विश्वास की वह भाषा है,

जिसका कोई विस्तार नहीं।

 

बचपन की गलियों से लेकर,

जीवन की कठिन डगर तक,

भाई-बहन का साथ बना रहे,

हर मौसम में, हर पहर तक।

 

बहन की आँखों में सपने हों,

भाई के मन में विश्वास रहे,

समय बदलता रहे भले ही,

रिश्तों में वही मिठास रहे।

 

न कोई शर्त, न कोई अपेक्षा,

बस अपनापन बना रहे,

जब जीवन थका हुआ हो कभी,

तो एक-दूजे का सहारा रहे।

 

राखी केवल कलाई पर

बंध जाने वाला धागा नहीं,

यह उन अनकहे वचनों की

एक सुंदर-सी परिभाषा है।

 

जहाँ रूठने में भी प्रेम रहे,

मनाने में भी अधिकार रहे,

दूर रहें चाहे कितने भी,

दिल में सदा परिवार रहे।

 

इस पावन रक्षासूत्र में

ईश्वर से बस इतनी प्रार्थना—

हर जन्म मिले यही रिश्ता,

हर जन्म रहे यही भावना।

 

धागा छोटा है, अर्थ अनंत—

यही राखी की पहचान है,

भाई-बहन के निर्मल रिश्ते में

बसता पूरा हिंदुस्तान है।

 

रचनाकर —

श्री ठाकुर 

देवघर (झारखंड )

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