
मन
सबसे बड़ा है दुश्मन अपना ही मन,
कैसे कहूँ मैं जग से, ऐसे कोई नहीं है दुश्मन।
मन ही है सबका कर्ता, मन ही है सबकी क्रिया,
यह मन मुग्धित है तुम्हारे प्रेम में,
फिर भी हृदय सिर्फ तुम्हें ही ढूँढ़ता है।
जब मन का समर्पण हो जाए,
मैं, मैं से हम बन जाए,
तभी अहंकार का नाश हो पाए,
और तभी मन की शांति पाए।
तुम्हारा प्रेम, कृष्ण, सिर्फ लक्ष्य की जीत नहीं है,
और न देह की प्यास ही है।
मेरे मन को वह नज़र आए,
हर पल, हर क्षण—हर साँस में,
सहज ही अर्पण हो जाए तेरे प्रेम में।
उन्हें तन नहीं, मन चाहिए,
प्रेम से भरा मन चाहिए।
सबसे बड़ा है दुश्मन अपना ही मन।
— नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद, झारखण्ड।




