आषाढ़ के बादल

आषाढ़ के बादल
डॉ. अंजली सामंत, डहाणू
“आषाढ़स्य प्रथम दिवसे” कालिदास स्मरण आए।
विरह की पीड़ा मन में छाए।
विरहिणी पिया को मन से पुकारे,
घने कजरारे बादल आए॥1॥
मुझे मेरे प्रियतम की याद सताए,
श्याम घटा में श्याम समाए।
राधा द्वार-द्वार ढूँढे कान्हा को,
श्याम प्रेम की बूँदें बरसाए॥2॥
रोम-रोम पुलकित हो जाए,
प्रेम-रंग में तन-मन नहाए।
प्रेम-रस की प्यासी विरहिणी,
बरसात में मग्न हो जाए॥3॥
मन में लगी है लगन, आओ पिया पास।
हर विरहिणी तरसे, करे विश्वास।
आषाढ़ के घने बादलों से अरज करे,
बरसो, बरसो मेरे आँगन में खास॥4॥
मयूर नाचे प्रियतम के साथ,
सारी सृष्टि झूमे, थापे हाथ।
पशु-पक्षी रट लगाएँ “पिया-पिया”,
चातक प्यासा बादल को ताके॥5॥
आषाढ़ मास में विट्ठल की वारी,
भक्त चले भक्ति की कतारी।
भक्ति-अमृत का करें पान,
आषाढ़ी एकादशी को हो विट्ठल दर्शन॥6॥
बलिराजा आशा से ताके बाट,
धरा हो जाए हरी-भरी।
जग को मिले धन-धान्य,
आषाढ़ के बादल भर दें जीवन में नवरस की झड़ी॥7॥



