मियाँ की तीजो

मियाँ की तीजो
सावन का महीना था। गली-मोहल्ले में तीज की तैयारियाँ जोरों पर थीं। कहीं मेहँदी रच रही थी, कहीं झूले पड़ रहे थे, तो कहीं सखियाँ तीज के गीत गा रही थीं।
मियाँ साहब की बेगम रोज खिड़की से पड़ोस की औरतों को सजते-सँवरते देखतीं और मन ही मन सोचतीं
“सबकी तीज मन रही है, बस हमारी ही किस्मत में सादा-सादा दिन लिखा है!”
एक दिन उन्होंने मियाँ साहब से कहा,
“सुनते हैं, इस बार हम भी तीज मनाएँगे।”
मियाँ साहब ने अखबार से नजर उठाई—
“हम भी? यानी मैं और आप?”
“नहीं जी! मैं तीज मनाऊँगी… आप तो बस खर्चा उठाइएगा।”
मियाँ साहब ने अखबार मोड़कर पूछा,
“कितना खर्चा?”
बेगम ने प्यार से कहा,
“अरे, खर्चे की बात क्यों करते हैं? तीज तो सुहाग का त्योहार है।”
मियाँ साहब समझ गए कि आज जेब की परीक्षा होने वाली है।
अगले दिन बेगम ने नई साड़ी मँगवाई। फिर चूड़ियाँ आईं, मेहँदी आई, बिंदी आई, पायल आई। मियाँ साहब ने पूछा,
“इतना सब क्यों?”
बेगम बोलीं,
“पड़ोस की शकीला ने भी नई साड़ी ली है।”
मियाँ साहब ने सिर पकड़ लिया—
“अच्छा! तो हमारी तीज का बजट शकीला तय करेगी?”
फिर मेहँदी वाली आई। बेगम ने दोनों हाथों में ऐसी मेहँदी लगवाई कि मियाँ साहब को पानी का गिलास तक उठाकर देना पड़ा।
बेगम बोलीं,
“जरा खाना भी खिला दीजिए।”
मियाँ साहब ने कहा,
“आज तो तीज का व्रत है न?”
बेगम ने गर्व से कहा,
“हाँ!”
“तो खाना क्यों?”
“मैं नहीं खाऊँगी… आप खिला देंगे!”
मियाँ साहब ने आसमान की ओर देखकर कहा,
“हे भगवान! तीज मेरी नहीं है, फिर भी परीक्षा मेरी क्यों हो रही है?”
शाम को मोहल्ले की सारी महिलाएँ सज-धजकर झूले पर पहुँचीं। बेगम भी नई साड़ी, मेहँदी और चूड़ियों में किसी दुल्हन से कम नहीं लग रही थीं।
सहेलियों ने छेड़ा—
“अरी, आज तो मियाँ की लंबी उम्र माँगना!”
बेगम मुस्कुराईं—
“लंबी उम्र तो रोज माँगती हूँ, आज बस इतना माँगूँगी कि अगले साल तीज का खर्चा भी खुशी-खुशी उठाएँ!”
पास खड़े मियाँ साहब ने यह सुन लिया।
उन्होंने धीरे से कहा,
“बेगम, मेरी लंबी उम्र की इतनी चिंता मत करो… मेरी जेब की उम्र भी कुछ होती है!”
सब महिलाएँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
रात को घर लौटते समय मियाँ साहब ने पूछा,
“तो कैसी रही आपकी तीज?”
बेगम मुस्कुराईं—
“बहुत अच्छी! अगले साल इससे भी अच्छी मनाएँगे।”
मियाँ साहब का चेहरा उतर गया।
उन्होंने धीरे से कहा—
“या अल्लाह! तीज तो आज खत्म हो गई, मगर इसका बिल अगले साल तक चलेगा!”
बेगम खिलखिलाईं और बोलीं—
“मियाँ, त्योहार साल में एक बार आता है… मगर आपकी शिकायत रोज आती है!”
मियाँ साहब ने मुस्कुराकर कहा—
“चलो, शिकायत भी आपकी… और तीज भी आपकी… हम तो बस आपके हैं!”
डॉ अपराजिता शर्मा
रायपुर
छत्तीसगढ़




