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शीर्षक: _आस

शीर्षक: _आस २७/०७/२६ सोमवार

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ताकती रहती होगी बाट… अम्मा मेरी……

करती होगी अम्मा मेरी …

इस सावन में मेरे आने की आस….

सूना होगा आँगन मेरा …

जहाँ बीते थे मेरे दिन-रात।

 

दिखती होंगी अम्मा मेरी अब भी वैसी ही,  

माथे पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी,  

दोनों हाथों में खनकती चूड़ियाँ।  

हँसते-हँसते निपटाती होंगी अपने सारे काज,  

और ….

सोचती होंगी मेरे लिए,  

“कब आएगी मेरी लाडो रानी …?”

 

जो कभी चहकती थी गुड़िया-सी,  

घर – आँगन में,

ताकती रहती होगी राह ।

बन गई है अब दुल्हन रानी

सजी सवरी रहती होगी,

क्यों आएगी लाडो को

मायके की याद….

 

भैया को भेज दो अम्मा,  

इस सावन की बड़ी आस है।  

तीज मनाऊँ, कजरी गाऊँ,  

हरी चूड़ियां खुशी खुशी खनकाऊं,

आँगन में झूला लगवा लूँ।

 

आ जाएगा भैया मेरा,  

सावन में पूरी होगी मायके की आस।  

सूना नहीं रहेगा आँगन अम्मा,  

इस बार सजेगी भैया की कलाई।

 

भेज दो अम्मा मेरे भैया को,  

इस सावन में मुझे लेने को।  

ताकती होंगी अम्मा मेरी  

सावन में मेरे आने की राह।

 

चौखट से आँगन तक  

बार-बार निहारती होंगी राह।  

थोड़ी सी आहट पर…

थोड़ी सी आहत पर ही….  

उठ कर आती-जाती होंगी,  

और कहेंगी “देखो, लाडो आई मेरी।”

 

 खुशी से गले लगाकर रोयेगी पूरी रात,

कैसी रहती लाडो मेरी ससुराल में,

जानेगी सारी बात…

बात बात टोकेगी और कहेगी,

मायका दो …दिन का 

लाडो रानी,

ससुराल ही ….वास

रहना तुम खुशी खुशी ,

आना कभी तीज त्योहार पर,

आने से पहले ही विदाई की करेगी पूरी बात…

ताकती होगी अम्मा मेरी…

मेरे मायके आने की बाट,….

 

इस सावन में पूरी होगी मेरी भी आस,  

करती होगी अम्मा मेरी !

ताकती रहती होगी राह….

इस सावन में मेरे आने की आस।

 

श्यामा प्रभाकर दास  

             मुम्बई

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