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होगा भ्रष्टाचार मुक्त भारत,
और हिन्दी राष्ट्र भाषा कब?
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सपने देखे थे सेनानियों ने
राष्ट्र हेतु खून बहाए थे जब।
भ्रष्टाचार मुक्त भारत होगा,
ये हिन्दी राष्ट्र भाषा हो तब।।
सपने तो सपने ही रह गए,
जड़ से पत्ती फैले भ्रष्टाचार।
हिन्दी राष्ट्र भाषा हो राष्ट्र में,
दिखता नहीं जी शिष्टाचार।।
देश नहीं ये स्वयं केन्द्रित हैं,
ये अपना करते हैं विकास।
जनहित का मुखौटा है बस,
रकम समेट रखते हैं खास।।
तीन-पाॅंच में लगे रहते दल,
चुनावी अखाड़े कुर्सी पाने।
चोर-चोर मौसेरे भाई बनके,
मिलजुल दीमक बन खाने।।
देशभक्तों के खून खौलते हैं,
निहारते ये शोषण के काज।
भ्रष्टाचार मुक्त भारत नहीं है,
राष्ट्र भाषा बिन कैसा ये राज।।
लोकतंत्र में जनता ही बड़ा,
लोकनायक बनने लगे दाॅंव।
चुनाव जीत गुण्डा गर्दी करें,
चुनाव समय पड़ते हैं पाॅंव।।
सम्प्रदाय-जाति का सुध ले,
नेता बिसर जाते हैं राष्ट्रवाद।
राष्ट्र सर्वोपरी समझना फिर,
लगते हैं हर हालत अपवाद।।
उन्नासी वर्ष उम्र आजादी के,
राष्ट्र-भाषा बिन चुप हैं सब?
होगा भ्रष्टाचार मुक्त भारत,
और हिन्दी राष्ट्र भाषा कब?
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स्वरचित मौलिक रचना संग
सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”
हथखोज / देमार (पाटन)
तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़
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