शीर्षक राष्ट्र का नव मंदिर

दिनांक 20.7.26
शीर्षक
राष्ट्र का नव मंदिर
जन-जननी जन्मभूमि का,
लोकतंत्र की जननी का।
देश की महत्वाकांक्षाओं का,
सांस्कृतिक वैभव के शिल्प का।
वास्तुकला की अनुपम मिसाल,
समर्पित यह नव मंदिर राष्ट्र का।
आत्मनिर्भर भारतवर्ष का,
बदलते वैश्विक परिवेश का।
संसदीय नव भवन भारत का,
दिव्य कल्पनाओं और भावनाओं का।
न्याय, मर्यादा और संरक्षण का,
सेंगोल—सुशासन की गौरवशाली व्यवस्था का प्रतीक।
जीवंत भारतीय सभ्यता का,
त्रिकोणीय संरचना की गतिशीलता का।
देवत्व की भव्य महानता का,
मानवीय संवेदनाओं की गरिमा का।
अलौकिक कलाकृतियों से सुसज्जित,
भारतीय संस्कृति की अनुपम मिसाल।
शोभायमान यह नव मंदिर,
जन-जननी जन्मभूमि का।
धन्य हैं वे जननी के लाल,
जिनके स्वेद-बिंदुओं से दमकते भाल।
अपनी अद्भुत कला का परिचय देकर,
जीत लिया देशवासियों का मन।
जन-जननी जन्मभूमि का,
शोभित है यह नव मंदिर राष्ट्र का।
अमिता मराठे
लेखिका एवं समाज सेविका
इंदौर मध्य-प्रदेश



