
“भीतर के हुनर बढ़ाते जाओ”
(कविता)
हुनर जिसे मालूम हो,
उसका बोले ज़माना है।
भीख में मिली इज़्ज़त को,
ठोकर मारकर जाना है।
मोहताज यहाँ भीड़ होती,
तालियों की ओ मनुष्यों!
सच कहो तो, हर शख्स को
बुरा लग जाना है।
सिफारिशों के साये में,
पलते जो बहुत लोग,
स्वयं की मेहनत से,
अपना नाम कमाना है।
कानून की किताबें तो,
धूल फांकती रह जातीं,
रिश्वत के हाथों से,
फैसला करवाना है।
मृषा को लिबास पहना,
बेचते जो बहुत लोग,
और सच को तो बस,
गली-गली भटकाना है।
नकली चेहरे बहुत,
मिलेंगे तुमको बाज़ारों में,
सत्य को आईने में,
स्वयं पहचानना है।
काल बदलता रहता है,
पर आदत नहीं बदलती,
औरों की छाया में जीना,
अब हमको त्यागना है।
मत पूछो गंतव्य का पथ,
तुम यहाँ किसी राही से,
स्वयं के पगों से,
अपना पथ बनाते जाना है।
जो गिरे हुए हैं जग में,
वही औरों को गिराते हैं,
मुझे तो बस हर हाल में,
स्वयं का कद और बढ़ाना है।
कहती है “ममता” मीत सुनो,
अब तुम इस पूरे ज़माने से,
इज़्ज़त मांगनी नहीं पड़ती,
इसे तो बस कमाना है।
ममता साहू
(कांकेर, छत्तीसगढ़)
लेखिका/कवयित्री/शिक्षिका




