शीर्षक: “हे एकलव्य! अब न देना अंगूठा अपना

दिनांक:- २९/०७/२६, बुधवार
शीर्षक: “हे एकलव्य! अब न देना अंगूठा अपना” ==================
श्यामा प्रभाकर दास_
हे एकलव्य!
तुम अब न देना अंगूठा अपना,
गुरु-दक्षिणा में बहुत दे चुके तुम।
शिष्य बनकर आदर्श निभाया,
कर्तव्य का हर धर्म निभाया।
पर अब न देना अंगूठा अपना…
द्रोणाचार्य ने अर्जुन के मोह में,
एकलव्य का त्याग माँग लिया।
दो शिष्यों में भेद किया,
और अपना शीश झुका लिया।
एक पाप अपने माथे चढ़ा लिया,
क्या किया आपने, हे गुरु द्रोण?
अपना सम्मान गिरा दिया,
राजकुमार अर्जुन के लिए
भील एकलव्य का बलिदान ले लिया।
हे एकलव्य! अब न देना अंगूठा अपना…
चाहे कहलाओ राज्यद्रोही,
या बनो त्याग की मूरत।
हो तुम भी तो एक मानव,
फिर अपना अधिकार क्यों खो दिया?
कैसे अपना अधिकार खो दिया?
न गुरु ने उत्तम शिष्य का मान दिया,
न बन सके तुम “उत्तम शिष्य”।
फिर क्यों अपना अंगूठा त्याग दिया?
एकलव्य, अब न देना अंगूठा अपना…
इतिहास के पन्नों में कहीं दूर,
तुम सिमट कर रह गए।
जब भी गुरु-शिष्य की कथा होती है,
अर्जुन सबसे पहले आता है,
और एकलव्य… तुम खो जाते हो।
एकलव्य, अब न देना अंगूठा अपना…
एकलव्य, अब न देना अंगूठा अपना…
🙏🏻🙏🏼
✍🏻श्यामा प्रभाकर दास
मुंबई




