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मोह

३०/०७/२६ गुरुवार

 

    मोह

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पुत्र मोह की बेड़ियों में फिर बंधी गांधारी,  

और जन्मा दुर्योधन अभिमानी।  

हे प्रभु! अब क्या होगा…?  

 

व्याकुल मन से पूछती हूं… विधाता :-

“क्या इस बार भी मेरा वर्षों का तप निरर्थक होगा…? “

 

 

तब गूंजी गिरिधर की वाणी:  

“हे गांधारी!  

जब-जब ममता के मोह में डूबकर,  

नयन होते हुए भी तुम अंधकार को चुनोगी,  

पुत्र के हर अधर्म पर अपनी दृष्टि पर पट्टी बांधोगी,  

तब-तब तुम्हारा तप राख हो जाएगा।  

 

यही पुत्र मोह कुल का संहार बन जायेगा ।

जिसके मोह में तुम प्राण दे रही हो,  

वही एक दिन शेष न रहेगा।  

 

अतः विलाप छोड़ो।  

गांधारी बनने से पूर्व ही  

दुर्योधन रूपी अहंकार का अंत कर दो।  

 

मोह के बंधन तोड़ दो।  

आत्मा को मुक्त करो।  

गिरिधर को श्राप से बचाओ,  

द्वारिका को डूबने से बचाओ।  

 

यदि अंकुर में ही विष हो,  

तो उसे पुष्प बनने से पहले काट दो।  

अब क्षमा नहीं, धर्म का निर्णय चाहिए।  

 

हे माते!  

ज्ञान की ज्योति जलाओ।  

अज्ञान की पट्टी उतार फेंको।  

सौ कुपुत्रों से अच्छा,  

एक धर्मशील सुपुत्र की अभिलाषा करो।  

 

समझो… इतना मोह उचित नहीं।  

कर्म, धर्म और तप का फल अवश्य मिलेगा।  

बस हृदय से दुर्योधन रूपी मोह का नाश कर दो।  

 

मन को जो मलिन कर रहा है,  

उसे गंगा सी पवित्र कर दो।  

फिर न कोई गांधारी होगी,  

 

न कोई दुर्योधन।  

न कोई महाभारत,  

न कोई प्रलय का तांडव ॥”

 

श्यामा प्रभाकर दास

           मुम्बई

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