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आमदनी

आमदनी

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किसी ने कहा है ..!!

कि …

आमदनी ..! सबको दिखती है !

पर,

खर्च ..किसी को नहीं दिखता …

अरे भाई !

हमें तो ना आमदनी दिखती है!

ना ही खर्च से कुछ बस्ता है …

बस जो मिल जाता है,

उसे में गुजर कर लेते हैं !

पापा की आमदनी ..

पूर्णिमा की चांद थी !

भाई की आमदनी ..

भाईदूज और राखी की गुमान है !!

बस 

ये ही है… हमारे श्रीमान जी !

जो देते हैं तो पूछते ही नहीं !

बस ,

कब खर्च करते करते कम पर जाती है !

पता भी नहीं चलता…

त्योहार आती है!

हर्ष उल्लास ले कर,

पर खर्चा ऐसी बढ़ा देती है !

क्या करूं….

निगाह टिकी रहती है….

कुछ रह सा जाता है…

कि !

कब संभल जाएं ..

तभी बड़े आराम से बीमारी भी आ जाती है…

कहते हैं ! ना

मध्यवर्गीय परिवार में ये सब होता रहता है….

जाने दो !!

 जाने दो…!!

बस जो मिले…

उसी में खुश रहो,

ये सोच सोच कर थोड़ा खुश हो जाते हैं …!

शायद ऐसी ही हालत सब की होती होगी

पर कभी कभी !

दिल टूट जाता है…

कि देखो एक हम हैं !

और एक वही हैं जो ना जाने कितना भी खर्च करे 

आमदनी कम नहीं होती!!

बढ़ती जाती है…!

जैसे कोई लक्ष्मी माता सीधे हाथ पर रख कर पैसे दे जाती है!!

जाओ जो मन करे खर्च करो… और कम पड़े तो लेना हमसे..!

कुछ भी समझ नहीं आ रहा ..

क्या हो रहा है..?

आमदनी !!

और…

खर्चा ….!!

बस इसी पर टिके बैठे हैं !

आगे कुछ सोच ही नहीं पा रहे थे !

कि ….

ये बजट भी आ जाती है बीच बीच में,

हमें हिला डुला कर चली जाती है …!!

महंगाई साथ ले आती है!

उफ्फ !

उफ्फ…!!

फिर से वही सब करना होगा…

थोड़ा इधर बचाओ…

थोड़ा उधर….

बड़ी सी लिस्ट बनानी पड़ेगी..!

इस बार सब अच्छे से करूंगी खर्चा …!

बच जायेंगे थोड़े पैसे…!

चलो यही सोच कर ..

थोड़ी देर खुश हो जाते है !!

  सच में !

आमदनी नहीं दिखती….

खर्च दिखता भी है..!

और ..

थोड़ा चुभ भी जाता है..!

कमाने वाले की दृष्टि ऐसे देखती है हमें !

कि जैसे सारे खर्च हम पर ही किए हैं …!!

पर…

हम क्या क्या गिनाए….

कि 

हमने कितना बचाया है..!

घर के फालतू खर्चों को भी घटाया है !

रोजमर्रा की कामों को खुद करके उठाया है।

जिम जाने का भी और बड़े बड़े होटल में न जाकर…

सिर्फ

पानी पूरी पर ही अपने को अटकाया है !!

बस बहुत हुआ ..!

ये कह कह कर दिल को बहुत समझाया है!!

छोड़ …

आमदनी !!

और…

खर्चे को…!!

जो मन में आया है…

बस कर ले….!

ये सुरसा की मुंह की तरह है..

बस ! बढ़ती ही जायेगी,,,

रुकेगी नहीं…!

तुम्हें हनुमान बन कर उसके मुंह से निकल जाना है ..!

अब चर्चा नहीं करना है..!

बस जो करना है तो करना है

और क्या….!!

 ✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास

मुंबई

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