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एक अहसास पुरानी सी

बिसरे पन्नों से निकाल रही आज वही तस्वीर पुरानी सी !!

एक अहसास पुरानी सी

बिसरे पन्नों से निकाल रही आज वही तस्वीर पुरानी सी !!

*********************** जग में सासू माता का शब्द लेकर रिश्ता हमसे जोड़ लिया था,

अपने ही रक्त अंश को मेरा सौभाग्य बनाकर नई पहचान बना दी,

जन्मदाता हमारी एक माता,

कर्मदाता आप बन गई,

दुनियादारी की रीत रिवाज को उतना ही मुझे करने दी, जितने में मैं रह सकू स्वतंत्र

जितने में मैं रह सकूं स्वतंत्र उतनी मुझे आज़ादी दी,

घर के चार दिवारों के बाद भी अपनी पंख फैलाने दी,

रिश्ता अपना था अनमोल

न चुका सकुंगी मोल,

आपके ही रक्त कण को मैं अपना सौभाग्य मानती,

अपनी माता से कम नहीं आंकती,

हर त्योहार में आती है याद आपकी

जैसे कहती थीं आप मुझको कामधेनु *नंदनी*,

साड़ी मुझ पर अच्छी लगती, पैर भी रंग लेना, अपनी हाथों में मेहंदी से मनचाहा आकृति रच लेना… बार-बार कह कर मुझको नव दुल्हन गुड़िया जैसी देखती, ढेरों आशीर्वाद के साथ जैसी हूं वैसी ही रहने कहती,

ठहाका लगाकर हमदोनों साथ में हो हंस लेते, खाना में क्या चटपटा बनेगा, दोनों मिलकर खा लेते…

चाय के बहाने, भुले बिसरे को याद करते…

छोटी छोटी बातों में ढेर सारी लम्बी कहानियां,

बड़ा सुन्दर रिश्ता अपना सास बहु की जोड़ी,

ये कोरोना ने आपको हमसे छिन लिया.,

सारे रिश्ते तोड़कर….

मुझको ऐसे भुलकर..

“माताश्री”…. आप चली गईं …

    🙏🏻🙏🏻

✍🏻 आपकी “नंदनी”

       श्यामा प्रभाकर दास

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