E-Paperसाहित्य रचना

जिंदगी अधूरी कभी नहीं ——-

जिंदगी अधूरी कभी नहीं ——- यह खामोशी की आवाज भी कितना शोर मचाती है।

कभी कभी भयंकर शोर में भी खामोशी सी छा जाती है।

 

हर पूर्णता के पीछे ये अपूर्ण क्यों छिपा होता है। काम पूर्ण होने के बाद भी जिंदगी अपूर्ण , अधूरी सी क्यों रह‌ जाती है।

 

जीवन के खालीपन को भरने के लिए जो भी सामान लाते और सजाते हैं।

वहीं सब एक दिन खालीपन का सबब क्यों बन जाते है?

 

साथ एक हमसफ़र का जीवन में माना बहुत सुख देता है।

परंतु उसके खो जाने का एहसास तो जीने ही नहीं देता है।

 

शांति की तलाश क्यों करते हैं हम वो तो हमारे पास पहले ही थी।

जब हम खुद ही खुद के साथ थे फिर डरने की कोई बात ही नहीं थी।

 

अब इस खालीपन के एहसास ने खुद को खुद से ही जब दूर कर दिया।

फिर इस खालीपन को भरने के लिए क्या-कुछ ना किया?

 

आज जब इस भीड़ में फिर से खामोशी छाई है ।

रह रह कर खुद को ही खुद की याद बहुत ही आई है।

 

वो बेपरवाही , वो सपने, 

वो मुस्कुराना ,वो सब अपने।

मालूम भी नहीं पड़ा कि कब कब में वो सब बन ग‌ए सपने।

 

जीवन जीना आज भी है माना कोई साथ नहीं है। फिर भी सुन ले ए जिंदगी हार तो नहीं मानूंगी मैं।

ढूंढ के खुद को ही ,

अपने साथ ही नया जहां बसा लूंगी मैं।

बहुत होंगे इस जहां में , किसी को तो मेरी भी जरूरत होगी।

उनके सपनों को ही पूरा कर के खुद को फिर से पा लूंगी मैं। मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!