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शीर्षक: इंद्रधनुष

शीर्षक: इंद्रधनुष

_अंजली सामंत

 

वर्षा में प्रकृति बौराई है।  

चारों ओर पन्ने-सी चादर बिछाई है।  

झरने घाटियों में झाग उड़ाते हैं,  

प्रत्येक पत्ते पर ओस के कण चमकते हैं॥1॥

 

पक्षी इधर-उधर चहचहाते हैं।  

गाय और बैल हरे चारे में मग्न हैं।  

मेंढकों का मंत्र-सा स्वर गूँजता है,  

वायु में मादक ध्वनि फैल गई है॥2॥

 

कृष्ण ने बांसुरी के स्वर छेड़े,  

उस धुन को सुनने इंद्रधनुष उतरा।  

सात रंगों की वर्षा करता हुआ,  

उसकी ध्वनि चारों दिशाओं में बस गई॥3॥

 

धुंध में इंद्रधनुष लिपट गया,  

सात रंग बिखेरकर पल में छिप गया।  

सृष्टि के साथ लुका-छिपी खेलते हुए,  

इंद्रधनुष राधा के गालों पर हँस दिया॥4॥

 

राधा-कृष्ण सात रंगों में सराबोर हुए,  

इंद्रधनुष के झूले पर झूलने लगे।  

नाद और गंध से सृष्टि भर गई,  

क्षण में ‘मैं’ और ‘तू’ का भाव मिट गया॥5॥

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