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इंतज़ार

इंतज़ार

बरसात अपनी पूरी रौ में थी। खिड़की के बाहर सब कुछ भीग रहा था—पेड़, छतें, रास्ते और आसमान तक। लेकिन खिड़की की सलाख पर अटका एक सूखा, पीला पत्ता अब भी बारिश से बचा हुआ था।

वह रोज़ उसे देखती थी।

कभी लगता, पत्ता नहीं, कोई प्रश्न है। कभी लगता, कोई स्मृति है जो भीगना नहीं चाहती। और कभी लगता, वह स्वयं है—समय की शाख से टूटकर भी किसी अदृश्य डोर से बंधी हुई।

आज बारिश कुछ अधिक थी। बूंदें शीशे पर लगातार दस्तक दे रही थीं। उसने खिड़की खोली। हवा का एक झोंका भीतर आया। पत्ता थरथराया, पर अपनी जगह बना रहा।

उसने अनायास सोचा—कितना अजीब है! जो अपने वृक्ष से बिछड़ चुका है, वह भी किसी का इंतज़ार कर सकता है।

मन में एक चेहरा उभरा।

कितने बरस बीत गए। रिश्ते शब्दों में बचे रहे, मुलाकातों में नहीं। फिर भी भीतर कहीं एक कोना था जो हर आहट पर चौकन्ना हो उठता था। जैसे कोई लौटकर आएगा और समय की सारी दूरियाँ मिट जाएँगी।

बारिश और तेज़ हो गई।

इस बार हवा के साथ आई एक बूँद पत्ते पर ठहरी। फिर दूसरी। फिर तीसरी।

धीरे-धीरे सूखा पत्ता भीगने लगा।

उसे लगा, शायद प्रतीक्षा का अर्थ किसी के आ जाने में नहीं, अपने भीतर बची हुई उम्मीद को जीवित रखने में है।

तभी एक तेज़ झोंका आया। पत्ता सलाख से छूटा और बरसती हुई बारिश में विलीन हो गया।

वह देर तक खाली सलाख को देखती रही।

अजीब बात थी—पत्ता चला गया था, पर प्रतीक्षा नहीं।

क्योंकि कुछ लोग जीवन में आते नहीं, फिर भी मन की खिड़की पर हमेशा बने रहते हैं। और कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं, जो पूरे होने के लिए नहीं, महसूस किए जाने के लिए जन्म लेते हैं।

 

डॉ अपराजिता शर्मा 

रायपुर, छत्तीसगढ़

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