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कभी करना प्रेम !

कभी करना प्रेम !

 उस स्त्री से….

जो मन के हर भाव में तुम्हें ढूढ़ती हो… !

अपनी हर रचना में तुम्हें देखती हो….!

सोचो तो ज़रा !

कैसी होगी वह स्त्री …?

जिसका आधार बन गए हो तुम !

कल्पनाओं में भी तुम्हें देखती…!

भाव की रचना से तुम्हें सजाती !

  उसकी कविता बन गए हो तुम !

जो कुछ उसके मन में है कविता में कह देती है। 

तुम उसकी विचारधारा से मिलते हो !

तभी तो प्रेरणा मिलती है!

अपनी रचना में तुम्हें देखना…

भाव लिखित ही कह देती है!

कभी समझना उसकी काल्पनिक संसार को !

जिसमें वह रचना की लेखनी को व्यक्त करती है।

आधार बने हो तुम !

स्तम्भ बने हो तुम !

तभी तो कविता लिखती है !

उसकी पंक्ति से झलकती होगी अनुराग की प्रीत…

या फिर…. कहीं दूर व्यथित सा…मन होगा ….

प्रतिपल मिलन का आस होगा…

बातों की लम्बी कहानी होगी पर अधर पर मौन होगा…

खिलखिलाती सर्दी की धूप सी चमकेगी,

गुनगुनाती सुरीली गीत गाएगी,

कभी मिलना… उस स्त्री से उसी का होकर!

जिसकी तुम कविता हो!

कभी करना …. प्रेम उस स्त्री से ! 

जो अपने भाव में तुम्हें देखती हो !!

जिसकी कविता में तुम बसते हो !!

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास 

     मुंबई

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