E-Paperसाहित्य रचना

शीर्षक:–दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।

शीर्षक:–दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।

 

दिल तोड़कर जाने वाले तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।

सावन की तरह नयना बरस रहा हैं।।

सपनें जो दिखाये थे क्यों तोड़ दिया

टूटे सपनों संग जीवन तड़प रहा हैं।

जीवन तड़प रहा हैं।

तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।।

दिल तोड़कर जाने वाले तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।।

 

पथराए से नयना मेरे

राहों में पलकें बिछाकर

बाट जाने क्यों निहार रहा हैं?

निहार रहा हैं।

छोड़ गया जो तु हमें

जीवन की बगियाँ उजड़ गई

उजड़े उपवन में कलियाँ ढ़ूंढ़ रहा हैं।

तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।

दिल तोड़ कर जाने वाले तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।।

 

यमुना किनारे बैठीं ब्रज की हर गोपियाँ

तेरी दरश की प्यासी है अँखियाँ

सागर के सीप जैसे तड़पती है आत्मा।

कुंजगली की गली गलियारें 

तिनका तिनका पत्ता पत्ता 

ब्रज का कण कण पुकार रहा हैं।

तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।

दिल तोड़कर जाने वाले तुझे दिल ढ़ूंढ़ रहा हैं।।

 

 स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!