E-Paperसाहित्य रचना

विश्व जनसंख्या दिवस पर एक

लघुकथा

 

विश्व जनसंख्या दिवस पर एक

लघुकथा

शीर्षक

             बिरादरी की सोच

 

राजू आटोवाला आते ही सीमा तेजी से बाहर आ गई थी। आज उसे विश्व जनसंख्या दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार रखने थे।

 कलफ वाली साड़ी सम्हालते हुए,सीमा ने पूछा, राजू आज देर हो गई? 

 जी मेम साब, परसो सुबह से अस्पताल जाना पड़ रहा था। बेटा हुआ है ना ।तीन बेटियों के बाद नसीब खुला है मेम। भगवान ने बेटियां भी क्या दी जो मूक-बधिर हैं। फिर भी मैं उनकी प्यार से पालना करूंगा। पढ़ाऊंगा मजबूत करुंगा।

 हकलाते हुए राजू ने इतनी मन की बातें कह डाली ।आज खजराना जाकर आया हूं। गणेशजी की मनौती मानी थी। उसका प्रसाद देते हुए मुस्कराने लगा।

 राजू अब चार बच्चे,तू अकेला कमाने वाला, घर में छः सदस्यों का पेट भरना बाप रे! ‘कैसे होगा?’

 मेमजी हमारी बिरादरी में जरूरी है चार पांच बच्चे होना। लड़का आ गया घर में बस , भगवान का शुक्रिया हैं कि वह लुगाई के भांति बोलता सुनता हैं,अरे! तूझे कैसे पता कि वह बोलेगा सुनेगा। डॉक्टर ने कहा लड़का स्वस्थ हैं।

   सीमा के व्याख्यान में नये पाइंट जुड़ रहे थे। भारत में “बिरादरी के सोच” अनपढ़ लोगों के मस्तिष्क से हटाना कितना कठिन काम है।

   “एक बच्चा नीति को प्रोत्साहित करने के साथ दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों के लिए कठोर नियमों का प्रावधान समझाना तो दूर की बात हो गई।”

 

अमिता मराठे

इंदौर, मध्यप्रदेश

स्वरचित

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!