शीर्षक: कर्म की पुकार

दिनांक:- २८/०७/२६,
दिन:- मंगलवार
शीर्षक: कर्म की पुकार
==================
देखो !
कर्म तुम्हें पुकार रहा,
पलट-पलट कर आ रहा…
न जवान देखे, न बूढ़ा,
न जात पूछे, न कोई बंधन,
सब पर अपना रंग जमा रहा…
देखो !
कर्म तुम्हें पुकार रहा।
जो किया सो किया,
यहाँ सब यहीं रह जाएगा,
कर्म के आगे विवश ही
हर कोई कहलाएगा।
कर्म ही सच समझा रहा…
देखो !
कर्म तुम्हें पुकार रहा।
अच्छे कर्म कर के भी
अभिमान मत करना,
बुरे कर्म ही एक दिन
आईना बन बतलाएंगे
तुमने कैसा कर्म किया।
कर्म ही सब सिखा रहा…
देखो !
कर्म तुम्हें पुकार रहा।
जैसा संग वैसा जीवन,
ये केवल आज का नहीं,
पूर्वजन्म का लेखा भी
साथ-साथ सहना सिखा रहा।
देखो !
कर्म तुम्हें पुकार रहा।
क्या पिता, क्या माता,
पुत्र से सीख मिल रही,
पुत्री के व्यवहार से भी
कर्म की परिभाषा दिख रही।
देखो !
कर्म तुम्हें पुकार रहा।
तन अब बूढ़ा हो चला,
अर्थ सब फीके पड़ गए,
स्वार्थ की धूल में रिश्ते
धीमी गति से घुल गए।
तब भी एक स्वर गूंज रहा…
कर्म… कर्म… कर्म…
यही चिल्ला रहा…
देखो !
कर्म तुम्हें ही पुकार रहा ॥
श्यामा प्रभाकर दास
मुम्बई




