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आषाढ़ मास की रिमझिम फुहार

आषाढ़ मास की रिमझिम फुहार
आषाढ़ आया, बादल छाए, रिमझिम पानी बरसाएं,
धरती मां की प्यास बुझाए हर दिल में है आस जगाए।
चिलचिलाती धूप के बाद ठंडी ठंडी बारिश की फुहार,
भींगे आषाढ़ सावन मास,बढ़े धरती मां का श्रृंगार।।
आषाढ़ है मिलन का महीना,
जगन्नाथ जी निकले हैं,
गुडिचा की ओर चले हैं भक्तों के श्रद्धा,आस खिले हैं।
ढोल-नगाड़े, जयकारे, रस्सी खींचते हुए हरेक हाथ,
आस्था के पहिए भीगते है, श्रद्धा,भक्ति, लिए विश्वास।
खेतों में किसान बीज बो दिए प्रफुल्लित भरे मन से,
आम की डाली झूमे, महके, कोमल गायें मधुर स्वर से।
पहली बारिश की खुशबू,बड़ी प्यारी सी मिले सौगात,
सूखे धरती के बाद आषाढ़ मे,हो पानी की बरसात ।
आषाढ़ की पहली बूंदें देख, किसान खुशी से झूम उठे,
धरती का श्रृंगार सजा हम सब की आस हुए पूरे।
चन्द्रकला शर्मा प्रधान पाठक बेमेतरा छत्तीसगढ़




