मुंशी प्रेमचन्द्र जी की जयन्ती

मुंशी प्रेमचन्द्र जी की जयन्ती
मुंशी प्रेमचन्द्र जी की जयन्ती पर शत-शत नमन।
उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के लमही ग्राम में हुआ था। उनका बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में मुंशी थे।
प्रेमचन्द्र जी पहले उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखते थे। 1909 में ‘बड़े घर की बेटी’ कहानी के बाद प्रेमचन्द्र नाम प्रसिद्ध हुआ। उनको कथा और कहानियों का सम्राट कहा जाता है। यह उपाधि उन्हें शरदचन्द्र चट्टोपाध्याय जी ने दी थी। उन्होंने अनेक कहानियाँ और उपन्यास लिखे, जो बहुत ही प्रसिद्ध हुए।
वे पहले डिप्टी इन्स्पेक्टर ऑफ स्कूल थे। असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर 1921 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और स्वतन्त्र रूप से लेखन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
उनकी भाषा सरल, मुहावरेदार और ऐसी थी, जिसे आम जनता आसानी से समझ जाती थी। इसी कारण उनकी लोकप्रियता बहुत बढ़ गई। उन्होंने गोदान, गबन, निर्मला, सेवा सदन, रंगभूमि, कर्मभूमि तथा कायाकल्प जैसे प्रसिद्ध उपन्यास लिखे।
कहानी के क्षेत्र में भी उन्होंने बहुत नाम कमाया। उन्होंने एक से बढ़कर एक कहानियाँ लिखीं। पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफ़न, ठाकुर का कुआँ तथा मानसरोवर के 8 भाग उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। उनकी कहानियों में किसान, मजदूर, विधवा, दलित तथा मध्यम वर्ग की पीड़ा को उजागर किया गया है। वे यथार्थवाद पर ही लिखते थे। जो सच था, उसी को अपनी रचनाओं का विषय बनाते थे। ‘गोदान’ में उन्होंने दिखाया है कि एक किसान किस प्रकार परिस्थितियों से लड़ता है।
मुंशी प्रेमचन्द्र जी ने किसानों के बहते आँसुओं का चित्रण अपनी कलम से बहुत ही अच्छे तरीके से किया। उस समय समाज की जो स्थिति थी, उसे उन्होंने बड़े ही यथार्थ और रोचक तरीके से व्यक्त किया।
8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया। ऐसे समाजसेवी लेखक को युग-युग तक याद किया जाएगा।
— नीलम प्रभा सिन्हा




