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शीर्षक:–पश्चाताप

शीर्षक:–पश्चाताप

 

सीने से लगाया जब तुझे

सारी खुशी मिल गई मुझे

उँगली पकड़ कर जब चली

जैसे बाग मे कली खिलीं।।

इतराता था आई हैं लक्ष्मी

शारदा बनकर जहाँ में 

पहचान बनकर चमकी।

मेरी शान बनकर चमकी।।

 

सपनों से भी सुंदर मैने  

तेरी डोली थी सजाई

पर जान ये न पाया हैं तेरी आखिरी विदाई।।

आँखों में जो थे अश्रु 

खुशी के थे या गम के जान मै न पाया।।

तु मान मेरा थी स्वाभिमान थी मेरा।

तेरी खुशी खातिर अपनी खुशी छोड़ा।।

तेरे लिए मैने क्या क्या नहीं सहा ?

पगड़ी भी मैने अपनी उतार था डाला।।

पर बिटिया मेरी ये मैं जान न पाया।

तेरे खुशी के बदले मैने मौत खरीद डाला।।

 

मेरी बिटिया जान न पाया

वो इंसा नहीं दरिंदा हैं।

इंसानों से प्यार नहीं

बस पैसों का भूखा भेड़िया हैं।।

तेरा दर्द समझ न पाया

तेरी आँखें पढ़ न पाया

अपनी इस नादानी पर कितना पश्चाताप करूँ?

मेरी बिटिया लौट तु आ जा

सुनकर आवाज तु आ जा।

मेरी नादानी को भूल कर 

मेरी बिटिया वापस आ जा।।

 

स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा

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