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राजनीति में धर्म उचित है

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      राजनीति में धर्म उचित है

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राज करने हेतु जो राजा,

        धर्म परायणता अपनाता है।

श्रीराम के आदर्श पथ से,

        छटा रामराज के सजाता है।।

 

राजनीति में कूटनीति से,

        राज धर्म धूमिल हो जाता है।

प्रजा सेवा त्याग शासक,

        स्वार्थ में शामिल हो जाता है।।

 

राजनीति में धर्म रहे तो,

         राजा न्यायविद बन जाता है।

ठाट-बाट त्याग सदा ही,

         वो जनसेवा को अपनाता है।।

 

राजनीति में धर्म सफल,

          धर्म आड़ कूटरचित विफल।

लडाई-झगडे परिणाम हैं,

         अशांति सबको करें विकल।।

 

धर्मवान राजनीतिक पथ,

         राजा-प्रजा संयमित होते हैं।

लूट-खसोट,चोरी-डकैती,

        मुक्त फिर चैन नींद सोते हैं।।

 

धर्म और राजनीति साथी,

        चोली-दामन का ही साथ है।

सतयुग-त्रेता-द्वापर-कलि,

        सदा धर्म पर नवाते माथ हैं।।

 

राजनीति धर्मवान करे तो,

        धर्मवीर-धर्मराज कहलाते।

आडम्बर राजनीतिक धर्म,

        तो शासक पालें मुगालते।।

 

राजनीति में धर्म उचित है,

        अगर नियत में खोंट नहीं है।

धर्म में व्यवसायिक दोहन,

        क्या ये मानवीय चोट नहीं है?

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स्वरचित मौलिक रचना संग

सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”

हथखोज देमार (पाटन)

तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़ 

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