नवीन और पुरातन ——–

नवीन और पुरातन ——–
नवीन और पुरातन में सदा रही लड़ाई है,
नवीन ने पुरातन को किया सदा धराशायी है।
नैतिक मूल्य पुरातन हो गए,
चहुँ ओर आज भौतिकता छाई है।
कन्या उसे ही वरण करेगी, जिसकी सबसे अधिक कमाई है,
संस्कारों, परिवारों का अब क्या करना है?
पुरुषों को भी केवल सुन्दर कन्या ही मन भाई है।
मात-पिता ने इस आधुनिकता में कहाँ जगह पाई है?
‘समझौता’ शब्द पुराना हो गया,
अब तो हर कोई अपने फायदे के लिए ही रिश्ता निभाता है।
सेवा-भाव पुरातन बातें,
प्रचलन में तो आज केवल निर्लज्जता आई है।
सुनकर कोई भी समाचार अब मन कहाँ घबराता है?
लूट-खसोट तो आम बात है,
कोई तो घर बैठे ऑनलाइन ही लुट जाता है।
गुणवत्ता मुखौटों की बढ़ गई है,
मधु, अब पहचान कहाँ कोई पाता है?
मुखौटे के पीछे जाने कौन अपना कैसा रूप छुपाता है?
इस नवीन रूप को देख पुरातन भयभीत हो जाता है,
कलयुग में जब नैतिकता की जगह,
छल ही प्रबल हो जाता है।
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मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा




