लहू से लिखी आज़ादी की दास्तान

लहू से लिखी आज़ादी की दास्तान
लहू से लिखी गई थी आज़ादी की दास्तान,
यह न समझो कि कागज़ पर स्याही से लिखी किसी ने।
रक्त से भरी तलवारें चली थीं अपनी आन के लिए,
मस्ताने झूल गए थे फाँसी के फंदों पर हँसते-हँसते।
1857 की पहली चिंगारी में वीरों की हुंकार थी,
झाँसी की रानी के दिल में आज़ादी की आग थी।
वीरों के साहस ने एक नई राह दिखाई,
भारत माँ की आज़ादी की एक नई आस जगाई।
चंद्रशेखर आज़ाद के सीने पर गोली लगी थी,
हर गोली पर इंकलाब की आवाज़ गूँजती थी।
मौत सामने थी, फिर भी कदम पीछे न हटे,
क्योंकि जीवन से बड़ा देश का स्वाभिमान था।
जलियाँवाला बाग की मिट्टी आज भी रक्त से सनी है,
उसकी मिट्टी में आज भी वीरों के रक्त की महक है।
हर क्षण याद दिलाती है कि खून की होली कैसी थी,
और आज़ादी की कीमत कितनी बड़ी थी।
पर किसी ने भी हिम्मत नहीं हारी,
सैकड़ों लाशें बिछीं, पर किसी ने झुकने का नाम नहीं लिया।
अपनी आज़ादी को अपने लहू से तौला था,
पर अपनी मिट्टी का मोल कभी नहीं आँका।
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और अनेकों वीर,
फाँसी के फंदे पर भी झूल गए हँसते हुए।
बहुतों ने कोड़ों की मार भी खाई,
घायल हुए, पर हिम्मत कभी नहीं हारी।
हमारे वीर शहीदों ने हँसते-हँसते,
अपने प्राणों की आहुति देकर तिरंगा लहराया।
इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे गूँजते रहे,
और भारत माँ की आज़ादी का सपना साकार हुआ।
दृढ़ संकल्प के साथ, चाहे कितने भी प्राण जाएँ,
अपनी धरती माता को आज़ाद कराएँगे।
हर शहीद की आख़िरी साँस यही कहती रही,
देश की मिट्टी अब ग़ुलाम नहीं रहेगी।
आज तिरंगा शान से लहरा रहा,
हर भारतवासी का सिर गर्व से उठा रहा।
यह लहू से लिखी आज़ादी की दास्तान है,
यह केवल इतिहास नहीं, कर्तव्य की पहचान है।
— नीलम प्रभा सिन्हा




