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शीर्षकःशोषण विकास हेतु

शीर्षकःशोषण विकास हेतु 

 

विकास कोई मजबुरी नही है।

सबका विकास ,देशका विकास है।

मगर चंद लोगों का विकास ,बाकी लोगों के जानपर आये तो सही नही होता।

खेती,समुंदर,धरा खोदकर प्रकृतिकी हानी होती है।

टावर,मोनोरेल,वाढवन बंदर ब्रीज बांधकर विकास दिखाते है।

अंटार्क्टीका का बरफ पिघलने लगा है।

नदीयाॅं बहेने लगी है।पानी बढकर प्रलय होगा।

श्रीशिवशंकरजी का प्रकोप होगा।जगका विनाश होगा।

मानव खूद का विकास करना चाहता है।

प्रकृति,जंगल के जनजातींयों का जंगल ,जमिन लेकर कोनसा विकास होगा?

जनजाती जंगल का संरक्षक कवच है।

जल,हवा,निसर्ग,प्राणी सबका संरक्षण करते है।

उनका विकास करना याने सभी प्रदूषण करना है।

जलसंवर्धन,मछली संवर्धन,पर्बत,जंगल,नदीयाॅं,तालाब,कुवा,बरसात सभी को प्रकृति के हिसाब से रहेने दो।

पकृतिपर सभी का अधिकार है।

मानव मेरा मेरा करते मत बैठना।

इश्वर की निर्मिती है इश्वर ही लेगा।

 

अकेले मानव का विकास ,मानवता का खंडन है।

शोषण करना विकास नही,विनाश है।

राजनितीज्ञ दिखाते हे सपने विकास के।लेकिन और का छिन के विकास नही हो सकता।

प्रकृतिकी देन मिटाके नही होता विकास।

 

नामःडाॅ.अंजली सामंत

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