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कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद जयंती

कलम के सिपाही

मुंशी प्रेमचंद जयंती

 

कलम का मजदूर कहकर, स्वयं को जो पहचान गए,

शब्दों से जन-मन की पीड़ा, जग के सम्मुख आन गए।

 

कहानी के थे शिल्पकार, उपन्यासों के थे आधार,

युग-प्रवर्तक बनकर छाए, हिंदी का बढ़ाया सत्कार।

 

गाँव, किसान और श्रमिक का, सच्चा चित्र उकेरा था,

शोषित, पीड़ित जनजीवन का, हर दुःख गहन सवेरा था।

 

गोदान की करुण कथा में, जीवन का संघर्ष लिखा,

गबन, निर्मला, सेवासदन में युग का सारा मर्म लिखा।

 

सच की मशाल लिए चलते, झूठ कभी स्वीकार न था,

मानवता का दीप जलाना, उनसे बढ़कर धर्म न था।

 

कलम बनी थी शस्त्र जहाँ पर, अन्यायों से लड़ी सदा,

साहित्य का पथ आलोकित कर, दी जन-जन को नई दिशा।

 

मुंशी प्रेमचंद अमर रहेंगे, जब तक हिंदी का सम्मान,

उनकी अमिट विरासत से ही, जीवित है भारत की शान।

 

जयंती पर शत-शत वंदन, शब्द-सुमन अर्पित हैं आज,

हे साहित्य-सूर्य! आपका, युग-युग तक रहेगा काज।

 

कलम का हर सच्चा साधक, आपसे प्रेरणा पाए,

प्रेमचंद के आदर्शों से, मानवता मुस्कान सजाए।

 

शत-शत नमन प्रेमचंद को, जिनका अमिट उजियारा है,

हर युग में उनकी लेखनी, मानवता का ध्रुवतारा है।

 

स्वरचित 

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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