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आनंदमय जीवन

आनंदमय जीवन

 

न कोई चिंता, न कोई प्रभार,

बस मुस्कुराता है घर-संसार।

 

जब मन में संतोष आ जाता,

जीवन आनंदमय हो जाता ।

 

सुबह प्रार्थना, धूप का टुकड़ा,

बच्चों की हँसी, फूलों का मुखड़ा।

 

छोटी छोटी खुशियों में जी लेता है,

वो हर दिन को उत्सव सा कर लेता है।

 

न बड़ी गाड़ी, न बड़ा नाम चाहिए,

बस दो रोटी, सच्चा काम चाहिए।

 

जिसने चाह को थोड़ा कम कर लिया,

उसने जीवन को ही जीत लिया।

 

किसी से बैर नहीं, किसी से जलन नहीं,

दिल में कोई छुपा हुआ छलन नहीं।

 

न किसी से तुलना,न किसी से होड़,

अपनी धुन में ही रहता है दौड़।

 

जो धन, दौलत में ही अटकता है,

वो जीवन को नहीं समझता है।

 

जो सेवा भाव में मन को लगाता,

वो कीमती जीवन को महकाता।

 

वो जो सबमें प्रभु स्वरूप देखता है,

आनंद उसी के पास आ बैठता है।

 

जो बाहर देखे भटकता रहता ,

जो अंदर देखें चमकता रहता।

 

जो कम में भी जीना सीख लिया,

वो आनंदमय रस का पान किया।

 

जो खुद के मन को बांध लिया,

वो आनंदमय जीवन जी ही लिया।

 

  चन्द्रकला शर्मा 

  प्रधान पाठक 

बेमेतरा छत्तीसगढ़

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