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विषय:—संबल 

विषय:—संबल 

 

जब राहों में काँटे हों,जब मौसम हो प्रतिकूल,

टूटे मन को जोड़ सके,ऐसा होता संबल।

 

जब कोई अपना हाथ थाम ले,तो हो जाएं प्रबल। 

जब सपनों के दीप बुझें,मन हो जाए व्याकुल।

सुख में सब साथ खड़े हैं,दुःख में कौन सहारा?

जो आँसू को पोंछ कहे—“मत डर, मैं हूँ तुम्हारा।”

 

नदियाँ पथ में रुकती कब हैं,चट्टानों से लड़ती हैं,

अपने दृढ़ संकल्पों के बल सागर तक बढ़ती हैं।

आँधी चाहे जितनी आए,झुकना नहीं, न डरना,

अपने भीतर ज्योति जलाकर हर अँधियारा हरना।

 

माँ की ममता संबल बनती,पिता बने विश्वास,

सच्चे साथी की एक हँसी में मिल जाता उल्लास।

कभी किसी की नेक दुआएँ बनती जीवन-बल,

कभी स्वयं का अटल हौसला बन जाता मनोबल। 

 

जीवन चाहे रण बन जाए हृदय दृढ बलशाली हो। 

मन में साहस जगाए ,वही हमारा सहचारी हो।

अपने भीतर दीप जला अँधियारे से लड़ता जाए। 

उसके जीवन का सबसे सुंदर

शब्द यही है“संबल।”

 

सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’

इन्दौर मध्यप्रदेश

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