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आज हिन्दी साहित्य बिकने लगे हैं

आज हिन्दी साहित्य बिकने लगे हैं

 

आज हिन्दी साहित्य की पुस्तकें खुले बाज़ार में बिक रही हैं,

डेढ़ सौ रुपये किलोग्राम के भाव से।

 

हिन्दी साहित्य लेखकों के हृदय में जीवित रहता है,

किन्तु वह आज के अधिकांश पाठकों के हृदय तक नहीं पहुँच पाता।

पाठक उसे पढ़ते हैं, अच्छा भी लगता है, पर कुछ ही दिनों में भूल जाते हैं।

लेकिन लेखक उसे जीवनभर याद रखता है, क्योंकि उसने अपने अनुभवों को स्वयं जीकर उन्हें शब्दों में ढाला होता है। इसलिए वह साहित्य उसके लिए कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

आज की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक हो चुकी है।

बाज़ार में आलू-टमाटर की तरह साहित्य बिक रहा है।

बोर्ड पर लिखा है—**”150 रुपये किलो।”**

प्रेमचन्द, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा और सुमित्रानन्दन पंत जैसे महान साहित्यकारों की पुस्तकें दुकानों में सजी हैं।

उनके पन्ने भले ही फट गए हों, स्याही धुँधली पड़ गई हो, पर उनके शब्दों में आज भी वही आग, वही संवेदना और वही चेतना जीवित है।

 

कोई ग्राहक पूछता है—

“कविता कितने की?”

उत्तर मिलता है—”दो रुपये किलो, उपन्यास आधा सेर।”

यह सुनकर मन व्यथित हो उठता है।

 

जिस हिन्दी ने हमें बोलना सिखाया,

सोचना सिखाया,

भावनाओं को शब्द देना सिखाया,

आज वही हिन्दी साहित्य कचरे के भाव बिक रहा है।

 

किताबें न जलती हैं, न दबती हैं;

वे तो चुपचाप मन और हृदय में उतर जाती हैं।

उनकी कीमत कोई धन देकर नहीं चुका सकता।

वे बिकाऊ वस्तु नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, विचार और सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं।

 

उन्हें केवल बाज़ार में रख देने से उनका मूल्य निर्धारित नहीं हो जाता।

सच्चा साहित्य कभी बिकता नहीं,

वह तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्यों के विचारों और संस्कारों में जीवित रहता है।

 

— नीलम प्रभा सिन्हा

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