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शिवमय संसार

शिवमय संसार

 

जहां देखो वहां शिव ही शिव,  

कण-कण में महादेव समाय।  

पर्वत पर कैलाश,जटा में गंगा,

जग में गूंजे ॐ नमः शिवाय।

 

सुबह की पहली धूप में शिव,  

रात के अंधेरे में शिव समाये,

पेड़ की शाखा,पत्तियां डोले,  

लगता शिवजी डमरू बजाये।

 

किसान के हल में भी शिव,  

मजदूर के पसीने में बहते।  

माँ की ममता में है समाहित, 

योगी मुनि के ध्यान में रहते।

 

जन्म में शिव, मरण में शिव,  

सृष्टि की शुरुआत में रहते हैं।

प्रलय के जलमग्न में भी शिव,

अंत केवल शिव ही रहते हैं।

 

विष पिया शिव जग हित,

अमृत सभी को बांट दिए।

शिव दयालु शिव है कृपालु,  

भक्तों के पीड़ा काट दिये।

 

शिव के लिए सभी समान,

न कोई छोटा नहीं बड़ा है।  

जो झुका शिव के चरणों में,  

शिव रक्षक बनकर खड़ा है।

 

  चन्द्रकला शर्मा 

  प्रधान पाठक 

बेमेतरा छत्तीसगढ़

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