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मेरे शब्द

बुधवार, 05/08/26 मेरे शब्द

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“शब्दों का एक छोटा सा घरौंदा”…. बना लूं ।

 

अपने थोड़े अरमानों से उसको “मैं सजा लूं”…. ।

 

“शब्दों के घरौंदे” के आगे 

“आशाओं का आंगन” होगा ।

 

नित नए नए पौधों के रूप में “नन्हा सा शब्द अंकुरित” होगा ।

 

सजा सजा कर प्यार से सींच सींच जब बड़ा करूंगी ।

 

उन शब्दों का प्रेम 

“आलिंगन मेरा ही होगा” ।

 

शब्दों का छोटा सा घरौंदा बना लूं ।

 

“लहराते शब्दों”से जब मन मचलेगा ।

उमंग भरी “सुंदर कविता” का जन्म तभी होगा ।

 

“आशा और निराशा” में द्वंद भी होगा ।

 

नव अंकुरण “पौधा” बना फल भी देगा ।

 

“खुशियों से भरा घरौंदा” में एक छोटा सा “घट”भी रख लूं ।

 

उसमें अपनी जमा पूंजी शब्दों कर रख दूं ।

 

शब्द तो मेरे ही होंगे

मुख तो शायद तेरा होगा ।

 

अब

 

घट से निकाल शब्दों की पूंजी…

कागज़ पर निखार… लूं ।

 

शब्दों का छोटा सा घरौंदा

 

प्रेम के कलम से उतार लूं

 

देखूं कितनी सजी हुई..

या कितना बाकी है….?

 

थोड़ी ही शब्दों की जमापूंजी है ।

 

उसी से उसको निखार… लूं ।

शब्दों का छोटा सा घरौंदा

        बना लूं…. ..।।

 

✍🏻 श्यामा प्रभाकर दास 😊 मुंबई😊

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