E-Paperसाहित्य रचना
सावन का झूला

सावन का झूला
कैलाश की चोटी पर बंधा है, चांदी का सावन झूला,
बदरा बरसे,डमरु बाजे, झूला
झूले उमा भोला।
गौरी पहनी हरी चूड़ियां, मेहंदी
रची हैं हाथों में।
सखियां गा रही कजरी गीत,
हंसी ठिठोली बातों में।
गौरा गौरी झूला झूले,पायल की स्वर गूंजे आज।
कैलाश में नंदी,भृंगी,श्रृंगी के,
भीगे मन की हर आवाज।
सावन झूला यादों का,प्यार भरा मन, प्रीत का है।
भाई-बहन,संगी सहेलियों का, गौरी-गौरा के गीत का है।
सावन का झूला झूलते-झूलते,
गम भी हल्के हो जाते हैं।
ऊपर बदरा बरसते पानी,मन
खुशियों में खो जाते हैं।
सावन का ये झूला कहता, प्रेम में त्याग भी होते हैं,
शिव-पार्वती, राधे कृष्ण की त्याग सफल होते हैं।
आओ झूले सावन झूला,मन निर्मल पावन हो जाये,
शिव-पार्वती, राधे कृष्ण की,पावन कृपा बरस जाए ।
चन्द्रकला शर्मा
प्रधान पाठक
बेमेतरा छत्तीसगढ़




