
विषय -दिल ही तो है
शीर्षक -गिरधर से लागा मन!
दिनांक -05/08/26
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गिरधारी रे! तेरे बिना मेरा
कोई नहीं,
मेरे उर की पीड़ा तू ही जाने।
मेरा हृदय सदा ही गिरधर,
तुझको अपना प्रियतम मानें।।
ये जगत है सारा छलिया,
तू ही मेरा है खेवनहार।
देख जग का वीभत्स रूप,
मेरा मन भी गया है हार!
जबसे शरण तुम्हारी आई,
मिट गए मेरे मन के छाले।
प्रभु राम नाम जपते -जपते,
पड़ गये है शब्दों के लाले!
तेरे विरह में गिरधर ,
मैं तो हो गई बावरी।
दर -दर भटकूंँ और,
खोजूँ पथरीले पथ में,
प्रेम दीवानी मैं नारी!
मेरे हृदय है गहन प्यास,
गिरधर गोपाल तेरी ।
एक पुकार प्रार्थना प्रभु से,
मिलन को है प्यास तेरी!
गिरधर से लागा मेरा मन,
मैं पुजारिन उनकी बन गई।
सांवरिया को दिल दे बैठी,
मैं दासी उनकी बन गई।।
गिरधारी रे तेरे बिना मेरा कोई नहीं —
सुषमा सिंह उर्मि
कानपुर




