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महाश्वेता देवी: अदब, इंसानियत और जद्दोजहद की अमर आवाज़

महाश्वेता देवी: अदब, इंसानियत और जद्दोजहद की अमर आवाज़

 

कुछ शख़्सियतें समय के पन्नों पर केवल अपना नाम नहीं लिखतीं, बल्कि एक पूरा दौर अपने भीतर समेटे होती हैं। महाश्वेता देवी ऐसी ही अज़ीम साहित्यकार थीं, जो अपने आप में एक युग थीं। उनकी क़लम ने साहित्य को केवल शब्दों का संसार नहीं बनाया, बल्कि उसे इंसानियत, न्याय और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम बना दिया।

 

महाश्वेता देवी की तहरीरों में दर्द भी है, एहसास भी, प्रतिरोध भी और इंसाफ़ की बुलंद आवाज़ भी। उन्होंने उन लोगों की दास्तान लिखी, जिनकी आवाज़ अक्सर समाज की भीड़ में दब जाती थी। उनकी लेखनी ने आदिवासी समाज, वंचित वर्ग और स्त्री-अस्मिता को एक नई पहचान और सम्मान दिया।

 

जब मैंने उनकी रचनाओं—”हज़ार चौरासी की माँ”, “अरण्येर अधिकार”, “रुदाली”, “द्रौपदी” और “झाँसी की रानी”—का अध्ययन किया, तब यह महसूस हुआ कि साहित्य केवल अल्फ़ाज़ का ख़ूबसूरत सिलसिला नहीं, बल्कि समाज के ज़ख़्मों पर मरहम रखने और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम भी है। “हज़ार चौरासी की माँ” एक माँ की असहनीय पीड़ा और व्यवस्था की संवेदनहीनता को हृदय तक पहुँचा देती है। “रुदाली” समाज की विडंबनाओं का आईना है, जबकि “अरण्येर अधिकार” आदिवासी अस्मिता और उनके अधिकारों का निर्भीक घोष है। उनकी प्रत्येक रचना पाठक के ज़ेहन में प्रश्न भी जगाती है और परिवर्तन का हौसला भी देती है।

 

एक लेखिका होने के नाते जब भी मैं उनकी रचनाओं से रू-ब-रू होती हूँ, तो यह एहसास और गहरा हो जाता है कि लेखनी का उद्देश्य केवल सौंदर्य रचना नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाना भी है। उनकी फ़िक्र, उनकी बेबाकी और उनकी इंसानियत-परस्त सोच मेरी साहित्यिक यात्रा को निरंतर प्रेरित करती है।

 

मैं यह दावा नहीं करती कि मैं उनके मुक़ाम तक पहुँच सकूँगी, क्योंकि महाश्वेता देवी अपने आप में एक युग थीं। किंतु मेरी ख़्वाहिश है कि मेरी क़लम भी उसी संवेदना, उसी मानवीय दृष्टि और उसी सामाजिक सरोकार को अपने सामर्थ्य के अनुसार आगे बढ़ाने का विनम्र प्रयास करती रहे। यदि मेरी रचनाएँ किसी एक व्यक्ति के मन में भी करुणा, न्याय और मानवता की लौ जगा सकें, तो यही मेरे लिए उनके प्रति सच्ची ख़िराज-ए-अक़ीदत होगी।

 

आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह संकल्प लें कि साहित्य को केवल पढ़ेंगे नहीं, बल्कि उसे समाज के कल्याण का माध्यम भी बनाएँगे। यही उनके प्रति हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

 

ख़िराज-ए-अक़ीदत

 

वो क़लम क्या, जो दर्द से वाक़िफ़ न हो,

वो अदब क्या, जो इंसानियत का हमसफ़र न हो।

महाश्वेता एक नाम नहीं, एक फ़लसफ़ा थीं,

वो अपने आप में एक युग थीं—उनकी रौशनी हमारी क़लम को भी इंसानियत की राह दिखाती रहे।

 

महाश्वेता देवी जी को शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

 

रचनाकार एवं समीक्षक

श्री ठाकुर

देवघर, झारखंड

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