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शीर्षक प्रेम गान

दिनांक 21.7.26
शीर्षक
प्रेम गान
प्रकृति के आनंद-वन में,
वसुंधरा का अनुपम श्रृंगार।
वनमाली की कोमल भावनाएँ,
गा रही हैं मधुर प्रेम-गान।
पुष्प-गंध से सुवासित हवाएँ,
धूप-बाती-सी महक रही हैं।
कलकल करती बहती सरिताएँ
प्रेम-स्वरों से जग महका रही है।
काँटों से भरी शाखाओं पर,
मुस्कराता है गुलाब-सम्राट।
आशा की किरणें बिखेरकर,
कहता है वह हर बार—
“विघ्नों में भी गाओ प्रेम-गान।”
ढाई आखर ‘प्रेम’ का,
होता है बड़ा बलशाली।
जो न मिलता हाट-बाज़ार में,
हर अंतस में रहता निराली।
पाषाण-सी बुद्धि भी पारस बन जाए,
प्रेम का जब छू ले स्पर्श।
उत्थान-पतन के हर दृश्य में,
प्रेम ही बनता जीवन का हर्ष।
प्रेम-गीतों की मधुरिमा से,
जन-मन पाए नव उल्लास।
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्नेह,
सराबोर करे असंख्य हृदयों का विश्वास।
— अमिता मराठे


