
ग़ज़ल :— गैरतमंद होना चाहिए
आशियाने को मकां नहीं घर बनाना चाहिए।
हर द्वार रुहानियत के दीपक जलाना चाहिए ।
लाख तूफां आए लगे चलते पग डगमगाने ,
अपने काफिले को जलसे सा सजाना चाहिए।
राह में गम मिलेंगे, दोस्त दुश्मन भी मिलेंगे,
कोई भी बिछुड़े नहीं सब साथ आना चाहिए।
तेरी मंजिल दूर है माना अंधेरा है घना,
दिल में आशाओं का दीप टिमटिमाना चाहिए।
ना कभी रोएँ न गिड़गिड़ाएँ किसी के सामने,
सदा भरोसेमंद , गै़रतमंद होना चाहिए।
जिन्दादिली ही आबरू है, जरूरत है तेरी,
बुजदिली न थाम हौसले बुलंद करना चाहिए।
डर-डर के जीने वाले नामर्द कहलाते हैं,
जीवन में बेखौफ हो हर गम छुपाना चाहिए।
सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’
इन्दौर मध्यप्रदेश




