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घूमड़े काली बदरिया

घूमड़े काली बदरिया

घूमड़े काली बदरिया देखो, छाई घटा अति घनघोर,
पवन चले पुरवईया सुंदर,मनवा झूमे नाचे मोर,
धरती प्यासी देख रही थी, ऊपर आसमान की ओर।
बिजली चमके चम-चम चम, बादल गरजे जोर जोर,
कोयलिया गावे कुहू-कुहू, पपीहा पी-पी नाचे मोर।
पेड़ झूमे, डाली डोले,फर-फर फर-फर पात की शोर,

किसानों के चेहरे पर अति,खुशियों से दिल भर आए,
खेतों में लहराए फसल, चहुं ओर हरियाली छाए।
बच्चे भीगें,नाचे,खेले, कागज की नाव चलाएं,
संगी साथी साथ बैठकर, गरमागरम पकौड़े खाएं।
सूखे मन में सावन भर दी, खुशी का संदेशा लाए।
पानी की फुहारों से ही,जीवन
आनंदमय हो जाएं,

तेरी एक फुहार से, धरती माता है मुसकाई,
बरसे काली बदरिया जब भी, नदियों में बाढ़ जो लाई।
फसलें हरी, घर आबाद कर, गंगा मैया मुसकाई।
मस्त पवनवा सर-सर सर-सर,पत्ता पत्ता लहराई।
चहक उठे हैं दुनिया सारी, ठंडी ठंडी पुरवाई।
घूमडे़ काली बदरिया जब भी, खुशियों के संदेश है लाई।

चन्द्रकला शर्मा
प्रधान पाठक
बेमेतरा छत्तीसगढ़

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